इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Smt. Anju and Another v. State of U.P. and 3 Others, Writ-C No. 10593 of 2026 में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कहा कि यदि दो व्यक्ति पहले से विवाहित हैं और उन्होंने सक्षम न्यायालय से तलाक की डिक्री प्राप्त नहीं की है, तो वे किसी तीसरे व्यक्ति के साथ live-in relationship में रहकर Article 226 के तहत protection की मांग नहीं कर सकते।

इस मामले में याचियों ने अदालत से प्रार्थना की थी कि उनके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप न किया जाए और उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए। याचियों का कहना था कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और उन्हें respondent no. 4 से जीवन के लिए खतरा है। दूसरी ओर, राज्य की ओर से यह कहा गया कि दोनों याची पहले से विवाहित हैं, उन्होंने तलाक नहीं लिया है, और इसलिए उनका यह संबंध विधि-सम्मत नहीं माना जा सकता। साथ ही, राज्य ने पहले के कुछ निर्णयों पर भी भरोसा किया, जिनमें Asha Devi, Bhagwati Pathwar और Smt. Sonam के मामले शामिल थे।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह अवश्य माना कि दो बालिग व्यक्तियों के वैयक्तिक संबंधों में सामान्यतः किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। परंतु न्यायालय ने साफ कहा कि personal liberty कोई निरंकुश अधिकार नहीं है। जहां एक व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त होती है, वहीं दूसरे के वैधानिक अधिकार शुरू होते हैं। यदि कोई व्यक्ति पहले से विवाहित है और उसका जीवनसाथी जीवित है, तो वह तलाक लिए बिना किसी तीसरे व्यक्ति के साथ वैध live-in relationship का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि पहले सक्षम न्यायालय से divorce decree प्राप्त करना आवश्यक है।

अदालत ने यह भी देखा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस material नहीं था जिससे यह साबित हो कि याची वास्तव में “relationship in the nature of marriage” की कसौटी पर खरे उतरते हैं। न तो joint account, न financial security, न joint property, न joint expenditure, और न ही ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत किया गया जिससे यह सिद्ध हो सके कि दोनों का संबंध वैवाहिक स्वरूप का था।

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है जहां कोर्ट ने बताया कि कौन से संबंध “relationship in the nature of marriage” नहीं माने जा सकते। अदालत ने कहा कि bigamous relationship, polygamy, या ऐसा संबंध जिसमें पहली शादी अभी भी विधिक रूप से कायम हो, उसे live-in relationship का संरक्षण नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना या ऐसा संबंध बनाना IPC की धारा 494/495 से जुड़ी आपराधिक स्थिति पैदा कर सकता है।

इसके बाद हाईकोर्ट ने mandamus के सिद्धांत पर भी जोर दिया। अदालत ने कहा कि writ of mandamus तभी जारी होती है जब याची के पास कोई विधिक, न्यायिक रूप से प्रवर्तनीय और वर्तमान अधिकार हो। यहां याचियों के पास ऐसा कोई subsisting legal right नहीं था। कोर्ट के अनुसार, यदि इस प्रकार protection दे दिया जाए, तो वह वस्तुतः ऐसे आचरण को संरक्षण देना होगा जो कानून के विरुद्ध हो सकता है। इसलिए Article 226 के तहत protection देने से अदालत ने इनकार कर दिया।

हालांकि, कोर्ट ने याचियों को पूरी तरह निराश नहीं किया। न्यायालय ने यह कहा कि यदि उनके साथ हिंसा होती है या उन्हें शारीरिक खतरा है, तो वे संबंधित Senior Superintendent of Police/Superintendent of Police के समक्ष प्रार्थना-पत्र दे सकते हैं। ऐसे आवेदन पर संबंधित पुलिस अधिकारी को तथ्यों का सत्यापन कर कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि याचियों के जीवन और शारीरिक सुरक्षा की रक्षा हो सके।

यह निर्णय एक महत्वपूर्ण कानूनी संदेश देता है। अदालत ने यह नहीं कहा कि हर live-in relationship अवैध है। बल्कि उसने यह स्पष्ट किया कि live-in relationship का संरक्षण पाने के लिए संबंध का विधि-सम्मत आधार होना चाहिए। यदि पहले से विवाह कायम है और तलाक नहीं हुआ है, तो ऐसे संबंध को अदालत वैधानिक संरक्षण देने से हिचकिचाएगी। दूसरे शब्दों में, personal liberty और statutory rights के बीच संतुलन ही इस फैसले की मूल आत्मा है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह आदेश बताता है कि Article 226 के तहत protection कोई automatic remedy नहीं है। यदि याचना ऐसे संबंध के संरक्षण के लिए हो जो prima facie कानून के विरुद्ध प्रतीत होता हो, तो हाईकोर्ट writ jurisdiction का प्रयोग नहीं करेगी। लेकिन यदि वास्तविक हिंसा या जान का खतरा हो, तो पुलिस संरक्षण हेतु वैधानिक उपाय अब भी खुले रहते हैं। इस प्रकार, अदालत ने personal liberty को स्वीकार किया, पर उसे कानून की सीमाओं के भीतर ही लागू माना।

Case Details
 Case WRIT – C No. 10593 of 2026 at Allahabad
 Petitioner Smt. Anju And Another
 Respondent State Of U.P. And 3 Others
 Petitioner Counsels Pankaj Kumar Tripathi
 Respondent Counsels C.S.C.
 District Agra