मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, ग्वालियर पीठ ने Krishnagopal Sharma and Others v. State of Madhya Pradesh and Others, MCRC No. 23881 of 2024 में एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए धारा 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया। न्यायालय ने ननद के विरुद्ध दर्ज FIR और उससे संबंधित कार्यवाही को निरस्त कर दिया, जबकि पति के खिलाफ IPC की धारा 377 के आरोप को भी समाप्त कर दिया। हालांकि, पति, सास और ससुर के विरुद्ध शेष आरोपों पर कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया गया।
यह मामला भिण्ड जिले के महिला थाना में दर्ज अपराध क्रमांक 21/2023 से जुड़ा था, जिसमें IPC की धाराएं 377, 354, 498-A, 323, 294, 506, 34, दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराएं 3/4 तथा Arms Act की धारा 30 लगाई गई थीं। शिकायतकर्ता पत्नी ने आरोप लगाया था कि विवाह के समय पर्याप्त दहेज दिए जाने के बावजूद आरोपीगण अतिरिक्त ₹6 लाख और एक बुलेट मोटरसाइकिल की मांग कर रहे थे। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे लगातार प्रताड़ित किया गया, उसके साथ शारीरिक और यौन दुर्व्यवहार हुआ, तथा ससुर द्वारा भी अनुचित व्यवहार और जान से मारने की धमकी दी गई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि ननद के विरुद्ध केवल सामान्य और सामूहिक आरोप लगाए गए हैं, कोई विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई। यह भी कहा गया कि धारा 164 Cr.P.C. के बयान तथा पूर्व में दायर धारा 125 Cr.P.C. की कार्यवाही में उसके विरुद्ध कोई ठोस आरोप नहीं थे। न्यायालय ने इस दलील में बल पाया और कहा कि ननद के विरुद्ध कोई स्पष्ट overt act सामने नहीं आता, इसलिए उसके खिलाफ अभियोजन जारी रखना प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर petitioner no. 4 के विरुद्ध FIR और समस्त consequential proceedings को quash कर दिया गया।
पति के संबंध में मुख्य प्रश्न IPC की धारा 377 के लागू होने का था। न्यायालय ने Section 375 IPC की संशोधित परिभाषा पर विस्तार से विचार किया और कहा कि 2013 संशोधन के बाद oral aur anal penetration जैसे acts भी rape की परिभाषा में शामिल हैं। इसके बाद कोर्ट ने यह प्रश्न उठाया कि वैध विवाह के दौरान पति-पत्नी के बीच ऐसे acts को क्या धारा 377 IPC के तहत अपराध माना जा सकता है। न्यायालय ने पूर्व निर्णयों, विशेषकर Manish Sahu v. State of M.P. और Umang Singhar v. State of M.P., का हवाला देते हुए कहा कि वैवाहिक संबंध के दौरान, Section 375 IPC की Exception 2 के कारण, ऐसे आरोपों पर धारा 377 IPC लागू नहीं की जा सकती। इसी आधार पर पति के विरुद्ध Section 377 IPC की कार्यवाही निरस्त कर दी गई।
फिर भी हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि बाकी आरोप, जैसे धारा 498-A, 354, 323, 294, 506, 34 IPC तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराएं 3/4, प्रथमदृष्टया रिकॉर्ड पर बने हुए हैं। अदालत ने कहा कि false implication, बयान में विरोधाभास, medical corroboration की कमी, या mala fide intention जैसे तर्क तथ्यात्मक विवाद हैं, जिनका परीक्षण ट्रायल में होगा, न कि धारा 482 Cr.P.C. की कार्यवाही में। इसलिए पति, सास और ससुर के विरुद्ध शेष धाराओं में मुकदमा जारी रहेगा।
यह आदेश दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों को सामने लाता है। पहला, परिवार के दूरस्थ या सहायक रिश्तेदारों के खिलाफ केवल सामान्य आरोप पर्याप्त नहीं होते; उनके खिलाफ विशिष्ट भूमिका का होना आवश्यक है। दूसरा, अदालत ने वैवाहिक संबंधों के संदर्भ में धारा 377 IPC की प्रयोज्यता पर अपने पूर्व न्यायिक दृष्टिकोण को दोहराया है। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज प्रताड़ना, मारपीट, शीलभंग और धमकी जैसे गंभीर आरोप यदि prima facie रिकॉर्ड पर मौजूद हों, तो उन्हें केवल प्रारंभिक चरण में समाप्त नहीं किया जा सकता।
यह निर्णय 25 मार्च 2026 को न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के द्वारा पारित किया गया।