इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम-2005 की धारा-20 के तहत जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई तभी की जा सकती है, जब संबंधित अधिकारी ने जानबूझकर या बिना ठोस कारण के सूचना देने में देरी की हो।

इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अजित कुमार, न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने याची आईपीएस अधिकारी शैलेश यादव के खिलाफ जुर्माना व अनुशासनात्मक कार्रवाई रद्द कर दी। शैलेश गाजियाबाद में क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी के रूप में तैनात थे। उस दौरान उनके पास सूचना अधिकारी का पदभार भी था। एक व्यक्ति ने उनसे पासपोर्ट के संबंध में जन सूचना अधिकार के तहत कुछ जानकारी मांगी थी।

निर्धारित समय में सूचना नहीं मिली तो मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंच गया। इस पर तत्कालीन सूचना आयुक्त ने वर्ष 2006-2007 में याची पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया और अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी आदेश दिया।

इस फैसले को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। अधिवक्ता ने दलील दी कि याची पर बिना किसी ठोस आधार के पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर अधिकतम 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। विभाग ने आंतरिक जांच रिपोर्ट में यह माना है कि पासपोर्ट कार्यालय में कर्मचारियों की भारी कमी और कार्यभार की अधिकता थी। इससे सूचना सही समय पर नहीं दी जा सकी। विभाग की जांच रिपोर्ट का आयोग ने संज्ञान नहीं लिया।

कोर्ट ने कहा- जल्दबाजी में सुनाया गया फैसला, टिप्पणी भी पक्षपात को दर्शाती है: कोर्ट ने कहा कि सूचना आयोग ने मुख्य पासपोर्ट अधिकारी की रिपोर्ट का इंतजार किए बिना जल्दबाजी में फैसला सुनाया। आयोग की ओर से अधिकारी के खिलाफ की गई टिप्पणी पक्षपात को दर्शाती है। सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अनजाने में देरी या प्रशासनिक बाधाओं के लिए कठोर दंडात्मक सिफारिशें नहीं की जा सकती।

Case Details
 Case WRIT – C No. 27261 of 2007 at Allahabad
 Petitioner Shailesh Kumar Yadav Ips
 Respondent Union Of India And Others
 Petitioner Counsels C.B. Yadav,Nisheeth Yadav,Rajesh Kumar Singh
 Respondent Counsels A.S.G.I.,S.C.,Santosh Kumar Mishra,Vinay Kumar Singh
 District Ghaziabad