Case Title: Union of India & Ors. v. Rohith Nathan & Anr. etc. with connected matters (Union of India v. Ketan & Ors.; Union of India & Anr. v. Dr. Ibson Shah I. & Anr.)
Neutral Citation: 2026 INSC 230
Date: 11 March 2026
Bench: Justice Pamidighantam Sri Narasimha and Justice R. Mahadevan

सुप्रीम कोर्ट ने OBC आरक्षण और क्रीमी लेयर निर्धारण पर एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी अभ्यर्थी को केवल उसके माता-पिता की आय या वेतन के आधार पर क्रीमी लेयर में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि क्रीमी लेयर तय करते समय केवल income test पर्याप्त नहीं है, बल्कि माता-पिता के पद, सेवा-स्थिति, सामाजिक स्तर और लागू सरकारी नीति को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

यह फैसला उन अनेक अभ्यर्थियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जिन्हें UPSC तथा अन्य सेवाओं में OBC non-creamy layer का लाभ केवल इस आधार पर नहीं दिया गया कि उनके माता-पिता PSU, बैंक, विश्वविद्यालय, बीमा संस्थानों या अन्य संगठनों में कार्यरत थे और उनका वेतन निर्धारित सीमा से अधिक था।

मामला क्या था?

विवाद उन सफल अभ्यर्थियों से जुड़ा था जिन्होंने OBC non-creamy layer श्रेणी में आरक्षण का दावा किया था। जांच के दौरान संबंधित प्राधिकरणों ने उनके माता-पिता की salary को आधार बनाकर उन्हें creamy layer मान लिया। कई मामलों में माता-पिता सरकारी कर्मचारी नहीं थे, बल्कि PSU, बैंक या अन्य संस्थानों में कार्यरत थे। केवल वेतन के आधार पर ऐसे अभ्यर्थियों को OBC आरक्षण से बाहर कर दिया गया।

इन अभ्यर्थियों ने इस कार्रवाई को चुनौती दी और मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1993 के Office Memorandum की मूल नीति को 2004 के clarificatory letter के आधार पर बदला नहीं जा सकता। अदालत के अनुसार, क्रीमी लेयर निर्धारण का प्रश्न केवल income-based arithmetic नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक-प्रशासनिक परीक्षण है।

कोर्ट ने साफ कहा कि:

  • सिर्फ माता-पिता का वेतन देखकर किसी को creamy layer नहीं माना जा सकता,
  • माता-पिता किस पद पर कार्यरत हैं, यह देखना जरूरी है,
  • उनकी service category और social status को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए,
  • status-based test को नजरअंदाज करके केवल income test लागू करना गलत है।

केवल salary को आधार बनाना क्यों गलत है?

अदालत ने माना कि salary income और सामाजिक/सेवागत स्थिति एक ही बात नहीं हैं। कोई व्यक्ति वेतन अधिक पाने के बावजूद उस सामाजिक स्तर पर नहीं हो सकता, जिसके कारण उसे automatically creamy layer में रखा जाए। यदि केवल salary को आधार बनाया जाएगा, तो कई ऐसे अभ्यर्थी भी OBC आरक्षण के लाभ से वंचित हो जाएंगे जो वास्तव में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग से आते हैं।

यही कारण है कि कोर्ट ने कहा कि income from salary alone cannot be the sole criterion.

PSU, बैंक और private sector के कर्मचारियों के बच्चों को राहत

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने यह माना कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों और PSU/अन्य संस्थानों में कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों के बीच सिर्फ employer के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यदि स्थिति, पद-स्तर और सामाजिक वास्तविकता समान है, तो सिर्फ salary structure के कारण अलग परिणाम निकालना असमानता को जन्म देगा।

अदालत ने कहा कि ऐसी व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के समानता सिद्धांत के खिलाफ होगी।

आरक्षण का असली उद्देश्य क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि OBC आरक्षण का उद्देश्य उन लोगों को अवसर देना है जो वास्तव में socially and educationally backward हैं। Creamy layer की अवधारणा इसलिए बनाई गई थी ताकि पिछड़े वर्गों के भीतर जो सामाजिक रूप से काफी आगे निकल चुके लोग हैं, वे आरक्षण का लाभ लगातार न लेते रहें और वास्तविक रूप से वंचित वर्गों तक अवसर पहुँच सके।

लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि creamy layer exclusion को लागू करने का तरीका तार्किक, न्यायपूर्ण और संविधान-सम्मत होना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार एक mechanical formula अपनाकर genuine OBC candidates को ही बाहर कर दे।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि प्रभावित अभ्यर्थियों के दावों की इस फैसले में तय सिद्धांतों के अनुसार दोबारा समीक्षा की जाए। यह प्रक्रिया छह महीने के भीतर पूरी करने को कहा गया है। अदालत ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर supernumerary posts बनाकर योग्य अभ्यर्थियों को समायोजित किया जा सकता है।

इस फैसले का महत्व

यह फैसला OBC reservation law में एक बड़ी स्पष्टता लेकर आया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि:

“सिर्फ माता-पिता की आय = क्रीमी लेयर”
यह फार्मूला अब कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं माना जा सकता।

अब सरकार और संबंधित प्राधिकरणों को यह देखना होगा कि creamy layer determination करते समय केवल income ceiling नहीं, बल्कि parental status, service category, post equivalence और policy framework को भी ठीक से लागू किया जाए।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला OBC आरक्षण व्यवस्था में समानता, न्याय और संवैधानिक संतुलन को मजबूत करता है। अदालत ने साफ कर दिया है कि क्रीमी लेयर निर्धारण एक जटिल और संतुलित प्रक्रिया है, न कि केवल income-based calculation. इसलिए किसी भी अभ्यर्थी को सिर्फ माता-पिता की salary के आधार पर OBC non-creamy layer का लाभ देने से वंचित नहीं किया जा सकता।

यह निर्णय उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके सामने अब तक parental salary के आधार पर unfair exclusion की समस्या आती रही है।