हाईकोर्ट ने दिया अनुशासनात्मक कार्यवाही की अवधि के बकाया वेतन-भत्ता भुगतान का आदेश

कोर्ट ने कहा- विभागीय गलती पर काम नहीं तो वेतन नहीं का सिद्धांत नहीं होता लागू

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि चेतावनी दंड नहीं है। अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान निलंबित रहे कर्मचारी पर काम नहीं तो वेतन नहीं का सिद्धांत लागू नहीं होता। ऐसे में वह निलंबन अवधि का पूरा वेतन और भत्ता पाने का हकदार है।

इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति विक्रम डी चौहान की एकल पीठ ने बुलंदशहर के नगर पालिका परिषद, गुलावठी में तैनात रही सफाई कर्मचारी मोहिनी देवी की याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने याची को 13 जून 2003 से तीन दिसंबर 2012 तक की लगभग नौ वर्षों की अवधि का पूरा पिछला वेतन तीन महीने के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया है।

मामले के मुताबिक याची नगर पालिका परिषद, गुलावठी में सफाई कर्मचारी थीं। उन्हें 2002 में निलंबित और 2003 में बर्खास्त किया गया था। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2012 में हाईकोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी रद्द कर दी थी। विभाग ने पुनः जांच कराई। मई 2013 में उन्हें चेतावनी देकर बहाल तो कर दिया पर बर्खास्तगी अवधि (2003-2012) का वेतन देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि उन्होंने इस दौरान काम नहीं किया था।

इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता सुरेश कुमार मौर्य ने दलील दी कि विभागीय सेवा नियमावली में चेतावनी दंड के रूप में परिभाषित नहीं है। लिहाजा इसको सजा मान कर याची को निलंबन व बर्खास्तगी अवधि के दौरान काम न करने का हवाला देकर वेतन और भत्ते से वंचित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने मेरठ के मंडलायुक्त की ओर से 2015 में पारित अपीलीय आदेश और अन्य संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया है। कहा कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली-1999 के तहत चेतावनी कोई निर्धारित दंड नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि एक बार जब अनुशासनात्मक कार्यवाही समाप्त हो जाती है और कर्मचारी को किसी दंड का भागी नहीं पाया जाता तो यह माना जाएगा कि कर्मचारी सदैव कार्य करने के लिए तैयार और इच्छुक था। यह विभाग की गलती थी, जिसने अपनी अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान निलंबन और बर्खास्तगी के जरिये कर्मचारी को जबरन काम से दूर रखा। ऐसी स्थिति में काम नहीं तो वेतन नहीं का सिद्धांत लागू नहीं होता। क्योंकि, कर्मचारी को काम करने से विभाग ने रोका था।

WRIT – A No. – 40860 of 2015 at Allahabad : Smt. Mohini Devi Vs. State Of U.P. And 3 Others
Date of Judgment/Order 
– 26/2/2026
Court Number – 34
Judgment Type – Final Non AFR
Coram – Hon’ble Vikram D. Chauhan,J.
Petitioner’s Counsels – Krishna Mohan , Mehdi Abbas , R.K. Srivastava and Suresh Kumar Maurya
Respondent’s Counsel – Baleshwar Chaturvedi and C.S.C.