उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण, लखनऊ ने सीमा यादव बनाम राज्य उत्तर प्रदेश व अन्य, याचिका संख्या 772/2024 में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए विभागीय दंड आदेश को निरस्त कर दिया। अधिकरण ने माना कि जब कर्मचारी आरोपों से इनकार करता है, तब मौखिक साक्ष्य, गवाहों की परीक्षा और विधिसम्मत विभागीय जांच आवश्यक होती है। केवल लिखित उत्तर के आधार पर दोष सिद्ध कर देना कानूनसम्मत नहीं है। निर्णय 11 मार्च 2026 को दिया गया।
प्रकरण क्या था?
याचिकाकर्त्री सीमा यादव, जो आबकारी विभाग में कार्यरत थीं, पर आरोप था कि एक पत्र, जिस पर हस्ताक्षर काट दिए गए थे, उसे बिना उचित परीक्षण के डिस्पैच कर दिया गया और संबंधित पक्षों को ई-मेल भी कर दिया गया। विभाग ने इसे लापरवाही, अनुशासनहीनता और विभागीय छवि धूमिल करने वाला कृत्य मानते हुए पहले निलंबित किया, फिर जांच के बाद परिनिंदा (censure) का दंड दिया। इसके बाद पुनर्विचार आवेदन और अपील भी खारिज कर दी गई।
अधिकरण ने क्या पाया?
अधिकरण ने रिकॉर्ड का परीक्षण कर पाया कि याचिकाकर्त्री ने शुरू से आरोपों से इनकार किया था और अपने उत्तर में यह कहा था कि यह कार्य जानबूझकर नहीं हुआ, बल्कि कार्यभार अधिक होने और प्रक्रियागत स्तर पर अन्य कर्मचारी की भूमिका के कारण त्रुटिवश हुआ। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने न तो आवश्यक मौखिक जांच की, न ही आरोप-पत्र में प्रस्तावित गवाहों के बयान दर्ज किए, और न ही अभिलेखीय साक्ष्यों को विधिवत सिद्ध कराया। यह उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के अनुरूप जांच नहीं थी।
मौखिक जांच क्यों जरूरी मानी गई?
अधिकरण ने स्पष्ट कहा कि जब आरोपित कर्मचारी आरोपों का खंडन करता है, तब जांच अधिकारी पर यह दायित्व होता है कि वह गवाह बुलाए, मौखिक साक्ष्य दर्ज करे और आरोपों को प्रमाणित करे। केवल कर्मचारी के उत्तर का उल्लेख करके “दोष सिद्ध” मान लेना न्यायसंगत नहीं है। इस आधार पर जांच रिपोर्ट को त्रुटिपूर्ण माना गया।
कारणयुक्त आदेश न होना भी घातक
अधिकरण ने यह भी पाया कि दंडादेश में याचिकाकर्त्री के स्पष्टीकरण पर वास्तविक विचार नहीं किया गया। आदेश में यह नहीं बताया गया कि कर्मचारी का बचाव क्यों अस्वीकार किया गया। केवल यह कह देना कि आरोप सिद्ध हैं, पर्याप्त नहीं है। विभागीय अथवा अर्द्ध-न्यायिक आदेशों में कारणों का उल्लेख आवश्यक है; अन्यथा वे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।
“Misconduct” और साधारण त्रुटि में अंतर
निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अधिकरण ने कहा—हर त्रुटि या लापरवाही अपने-आप में “misconduct” नहीं होती। यदि कृत्य के पीछे दुर्भावना, बुरी नीयत या जानबूझकर किया गया आचरण सिद्ध नहीं है, तो केवल एक त्रुटि के आधार पर दंडात्मक दोषारोपण उचित नहीं होगा। रिकॉर्ड से यह नहीं सिद्ध हुआ कि याचिकाकर्त्री ने कोई कार्य दुर्भावना से किया था। अधिकरण ने माना कि यह अधिक से अधिक कार्यकुशलता की कमी या कार्यभार के बीच हुई त्रुटि का मामला था, न कि सिद्ध “misconduct” का।
निलंबन अवधि का वेतन भी देय
अधिकरण ने यह भी कहा कि चूँकि मूल दंडादेश ही विधि-विरुद्ध पाया गया, इसलिए उसके आधार पर की गई आगे की कार्यवाही भी टिक नहीं सकती। साथ ही, रिकॉर्ड से यह स्पष्ट था कि याचिकाकर्त्री को निलंबित किया गया था और बाद में बहाल किया गया। ऐसे में अधिकरण ने माना कि निलंबन अवधि का वेतन भी देय होगा।
अंतिम आदेश
अधिकरण ने:
- दिनांक 30.08.2023 का दंडादेश निरस्त किया
- दिनांक 26.09.2023 का पुनर्विचार निरस्तीकरण आदेश रद्द किया
- दिनांक 20.03.2024 का अपीलीय आदेश भी निरस्त किया
- रोके गए सेवा-लाभ देने का निर्देश दिया
- आदेश के अनुपालन हेतु विभाग को समय-सीमा भी निर्धारित की
निर्णय का महत्व
यह फैसला विभागीय कार्यवाहियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे तीन स्पष्ट सिद्धांत उभरते हैं:
- आरोपों से इनकार होने पर मौखिक जांच अनिवार्य है।
- दंडादेश कारणयुक्त होना चाहिए; केवल औपचारिक निष्कर्ष पर्याप्त नहीं।
- साधारण त्रुटि, यदि दुर्भावना रहित हो, तो उसे स्वतः “misconduct” नहीं माना जा सकता।
यह निर्णय उन कर्मचारियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जिनके विरुद्ध विभागीय जांच में केवल कागजी औपचारिकताएँ पूरी कर दंड दे दिया जाता है, परंतु साक्ष्य, गवाह और कारणयुक्त निष्कर्ष का अभाव रहता है।