इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को उसके पेशे (profession) के आधार पर संबोधित करना मात्र, अपने आप में, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं बनाता, जब तक यह सिद्ध न हो कि ऐसे शब्द जानबूझकर अपमानित करने की नीयत से कहे गए थे।
यह फैसला आपराधिक अपील संख्या 233/2026 में माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार-एक्स द्वारा 24 फरवरी 2026 को सुनाया गया।
क्या था मामला?
मामला एक शिकायत से संबंधित था जिसमें आरोप लगाया गया था कि शिकायतकर्ता, जो कपड़े धोने का काम करती थीं, अपने बकाया मजदूरी की मांग करने गई थीं। इसी दौरान विवाद हुआ और कथित रूप से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया गया।
ट्रायल कोर्ट द्वारा आईपीसी की धाराओं 323, 504, 506 के साथ-साथ एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(Da) और 3(1)(Dha) के तहत अभियुक्तों को तलब किया गया था। इसके खिलाफ अपील दायर की गई।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
न्यायालय ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि:
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शिकायतकर्ता स्वयं यह स्वीकार कर रही थीं कि वह अभियुक्त के यहां कपड़े धोने का कार्य करती थीं।
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कथित विवाद मजदूरी मांगने को लेकर हुआ।
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शिकायत में यह कहा गया कि “जातिसूचक शब्द” और “धोबिन” शब्द का प्रयोग किया गया।
अदालत ने कहा कि जब दोनों पक्षों के बीच एक पेशेवर/संविदात्मक संबंध (contractual relationship) था, और शिकायतकर्ता कपड़े धोने का कार्य करती थीं, तब मात्र “धोबिन” जैसे पेशे से जुड़े शब्द का प्रयोग अपने आप में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
अदालत का कानूनी विश्लेषण
न्यायालय ने स्पष्ट किया:
केवल किसी व्यक्ति को उसके पेशे से संबोधित करना, तब तक एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनेगा, जब तक यह साबित न हो कि वह शब्द विशेष रूप से अनुसूचित जाति/जनजाति से संबंधित व्यक्ति को अपमानित करने की नीयत से प्रयोग किया गया था।
अर्थात, “इंटेंशन टू ह्यूमिलिएट” (अपमानित करने की मंशा) इस प्रकार के मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है।
अदालत का अंतिम आदेश
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एससी/एसटी एक्ट की धाराओं 3(1)(Da) और 3(1)(Dha) के तहत जारी समन आदेश और कार्यवाही को रद्द (quash) कर दिया गया।
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हालांकि, आईपीसी की धाराओं 323, 504 और 506 के तहत कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया गया।
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