मामला: Sultan Singh Nagar v. State of Madhya Pradesh & Ors.
कोर्ट: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ (Justice Anand Pathak & Justice Anil Verma)
दिनांक: 24 फरवरी 2026 | Writ Appeal No. 516/2026 | Neutral Citation: 2026:MPHC-GWL:7440

1) केस की पृष्ठभूमि (Facts)

अपीलकर्ता (Sultan Singh Nagar) उस समय Assistant Sub Inspector (Police) के पद पर कार्यरत था। आरोप यह था कि 07–08 मई 2011 की रात को उसने सह-कर्मियों के साथ मिलकर राजधानी एक्सप्रेस से कोटा रेलवे स्टेशन पर शिकायतकर्ता Babu Singh को उतारकर अपहरण किया और उसके पास से लगभग 4072.700 ग्राम सोना लूटा। इसी आधार पर IPC 365/392/34 के तहत आपराधिक मामला दर्ज हुआ और साथ ही विभागीय जांच भी शुरू हुई।

आपराधिक मुकदमे में अपीलकर्ता 30 जून 2016 को बरी हुआ (Sessions Trial No.45/2014, Kota), लेकिन विभागीय जांच के बाद उसे 11 मई 2021 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया; उसकी अपील/दया याचिका भी खारिज हुई। इसके खिलाफ दायर रिट याचिका (WP 11808/2021) 27 जनवरी 2026 को खारिज हुई—इसी के विरुद्ध यह Writ Appeal थी।

2) अपीलकर्ता की मुख्य दलीलें

अपीलकर्ता ने मुख्यतः यह कहा कि—

  • उसे पर्याप्त सुनवाई/अवसर नहीं मिला।
  • Evidence Act की धारा 65-B का प्रमाणपत्र और CCTV फुटेज को आधार बनाकर दंड नहीं दिया जा सकता।
  • जब वह आपराधिक मुकदमे में बरी हो चुका है, तो बर्खास्तगी टिक नहीं सकती।

3) कोर्ट का कोर निष्कर्ष: “Mere acquittal” से विभागीय कार्रवाई नहीं रुकती

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमा और विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही—दोनों की प्रकृति, मानक (standard of proof) और उद्देश्य अलग हैं। इसलिए केवल आपराधिक बरी होना विभागीय दंड को स्वतः निरस्त नहीं करता।

कोर्ट ने इस सिद्धांत के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का सहारा लिया, जैसे—

  • M. Paul Anthony v. Bharat Gold Mines Ltd. (1999) 3 SCC 679: समान तथ्यों पर दोनों कार्यवाहियाँ चल सकती हैं; कुछ स्थितियों में विभागीय जांच स्थगित करना “desirable” हो सकता है, पर यह कोई कठोर नियम नहीं।
  • Nelson Motis v. Union of India (1992) 4 SCC 711: आपराधिक बरी होने से विभागीय जांच “conclude” नहीं होती।
  • State of Karnataka v. Umesh (2022) 6 SCC 563: वही सिद्धांत दोहराया गया।

4) “Honourable acquittal” बनाम “Benefit of doubt acquittal”

इस केस में कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि अपीलकर्ता की आपराधिक बरी “benefit of doubt” के आधार पर हुई थी—इसे honourable acquittal नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने Dy. Inspector General of Police v. S. Samuthiram (2013) 1 SCC 598 का उल्लेख करते हुए कहा कि जब बरी होना गवाहों के hostile होने/तकनीकी कारणों से हो, तो वह विभागीय निर्णय को स्वतः प्रभावित नहीं करता और स्वतः reinstatement का आधार नहीं बनता।

इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि यहां शिकायतकर्ता सहित कई गवाह hostile हुए और बरी “benefit of doubt” पर हुई, इसलिए विभागीय दंड पर उसका निर्णायक असर नहीं होगा।

5) Natural Justice / अवसर का मुद्दा: कोर्ट ने माना “पर्याप्त अवसर मिला”

कोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर पाया कि विभागीय जांच में तीन आरोप तय हुए, विस्तृत जांच हुई, अपीलकर्ता को written statement देने और गवाहों की cross-examination का अवसर मिला; बयान दस्तावेजी साक्ष्य से समर्थित पाए गए। इसलिए “पर्याप्त सुनवाई नहीं मिली” वाली दलील कोर्ट ने अस्वीकार कर दी।

साथ ही कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि Article 226 में हाईकोर्ट का रोल मुख्यतः decision-making process की जांच करना है—वह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करके “अपील कोर्ट” की तरह अपना फैसला प्रतिस्थापित नहीं करता।

6) साक्ष्य/मिसकंडक्ट पर कोर्ट की दृष्टि

कोर्ट ने विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर यह नोट किया कि सह-दोषी/सहकर्मी (constable) के बयान में भी अपीलकर्ता के विरुद्ध बातें आईं और यह निष्कर्ष निकला कि अपीलकर्ता ने अपनी jurisdiction से बाहर जाकर पद का दुरुपयोग करते हुए घटना में भूमिका निभाई।

कोर्ट ने यह भी कहा कि विभागीय जांच और आपराधिक मुकदमे में उपलब्ध साक्ष्य समान नहीं हैं; विभागीय जांच में शिकायतकर्ता का बयान दर्ज हुआ, भले cross में hostile हुआ हो—पर समग्र रिकॉर्ड/दस्तावेजों से आदेश “cogent evidence” पर आधारित पाए गए।

7) दंड “Disproportionate” नहीं: पुलिस बल की उच्च अपेक्षाएँ

कोर्ट ने पुलिस सेवा के संदर्भ में State of M.P. v. Pervez Khan (2015) 2 SCC 591 का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस एक disciplined force है; जनता का विश्वास उससे जुड़ा है; इसलिए चरित्र/ईमानदारी की अपेक्षा उच्चतम होती है।
इसी दृष्टि से आरोप “loot/abduction” जैसी गंभीर प्रकृति के होने पर कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ता sympathetic view का पात्र नहीं है और बर्खास्तगी को असंगत/अत्यधिक नहीं कहा जा सकता।

8) अंतिम परिणाम

इन सभी कारणों से हाईकोर्ट ने कहा कि रिट कोर्ट के आदेश में कोई illegality/perversity नहीं है और no case is made out for interference in appellate writ jurisdiction; परिणामतः Writ Appeal खारिज कर दी गई।