इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ पीठ ने क्लास-III/IV (ग्रुप C/D) कर्मचारियों के वेतन-मान/पे-फिक्सेशन से जुड़े मामलों में एक अहम आदेश देते हुए कहा कि केवल ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर वर्षों बाद वेतन-मान वापस लेना और वेतन से कटौती/रिकवरी करना—बिना अवसर-ए-सुनवाई—कानूनन उचित नहीं है। कोर्ट ने ऐसे सभी “रिकवरी/एडजस्टमेंट” वाले आदेशों को रद्द (quash) कर दिया और निर्देश दिया कि क्लास-III/IV कर्मियों से की गई कटौती/वसूली 8 सप्ताह में लौटाई जाए।
मामला क्या था?
कई याचिकाओं (bunch of petitions) में कर्मचारियों ने यह चुनौती दी थी कि उनके लिए पहले से लागू वेतन-मान/पे-स्केल को बाद में “गलत/अमान्य” बताकर संशोधित कर दिया गया और साथ ही अतिरिक्त भुगतान बताकर रिकवरी/वेतन से कटौती के आदेश जारी किए गए। कोर्ट के सामने यह भी आया कि ये आदेश लंबे समय बाद जारी किए गए और मुख्यतः ऑडिट आपत्तियों के आधार पर थे।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणी
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखकर माना कि—
- कर्मचारी क्लास-III/IV श्रेणी के हैं,
- जिन पे-स्केल को वर्षों पहले लागू किया गया था, उन्हें काफी समय बाद वापस लिया गया,
- आदेश सिर्फ ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर पारित दिखते हैं,
- सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया,
- और कर्मचारियों पर धोखाधड़ी/गलत बयानी (fraud/misrepresentation) का कोई आरोप नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का “Rafiq Masih” सिद्धांत लागू
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले State of Punjab v. Rafiq Masih (2015) 4 SCC 334 का हवाला देकर कहा कि कुछ परिस्थितियों में नियोक्ता द्वारा गलती से हुए “अतिरिक्त भुगतान” की रिकवरी कानूनन निषिद्ध मानी गई है—विशेषकर:
- क्लास-III/IV कर्मियों से रिकवरी
- सेवानिवृत्त या 1 वर्ष में सेवानिवृत्त होने वाले कर्मियों से रिकवरी
- यदि 5 वर्ष से अधिक अवधि तक अतिरिक्त भुगतान हुआ हो और फिर रिकवरी आदेश निकाला जाए
- उच्च पद का कार्य करवाकर भुगतान, जबकि पद निम्न हो
- अन्य स्थितियाँ जहाँ रिकवरी अत्यधिक अत्याचारपूर्ण/मनमानी/अनुचित हो
अंतिम आदेश: क्या राहत मिली?
हाईकोर्ट ने:
- सभी याचिकाओं में रिकवरी/वेतन-मान वापसी से संबंधित विवादित आदेश रद्द कर दिए।
- राज्य/विभाग को पे-फिक्सेशन पर नए सिरे से आदेश पारित करने की छूट दी—लेकिन शर्त यह कि पहले कर्मचारियों को सुनवाई का अवसर दिया जाए और उनका जवाब/प्रतिवेदन विचार किया जाए।
- चूंकि कर्मचारी क्लास-III/IV हैं, इसलिए उनके वेतन से की गई कटौती/रिकवरी की रकम 8 सप्ताह में रिफंड की जाए (प्रमाणित प्रति दिए जाने की तिथि से)।
- निर्णय लेते समय सरकारी आदेश दिनांक 16.01.2007 के अनुरूप कार्रवाई करने का संकेत भी दिया गया।
केस संदर्भ (मुख्य): WRIT-A No. 11575 of 2024 (और संबद्ध याचिकाएँ), कोर्ट: AHC लखनऊ, माननीय न्यायमूर्ति Manish Mathur, आदेश दिनांक 08.08.2025।