केरल हाईकोर्ट (न्यायमूर्ति C.S. Dias) ने कहा कि मजिस्ट्रेट किसी निजी शिकायत (private complaint) को केवल इस आधार पर वापस/लौटा नहीं सकता कि शिकायतकर्ता ने आरोपी का डाक/पोस्टल पता नहीं दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “processual rules are the handmaid of justice” यानी प्रक्रिया संबंधी नियम न्याय के सहायक हैं, न्याय पर हावी नहीं हो सकते—खासतौर पर साइबर अपराधों में।
मुख्य तर्क:
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साइबर मामलों में आरोपी अक्सर छद्म पहचान/सोशल मीडिया हैंडल के पीछे होता है; ऐसे में प्रारम्भिक स्तर पर पोस्टल पता मांगना “substantive justice” को “procedural rigidity” के अधीन कर देगा।
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जब कानून “unknown persons” के खिलाफ भी (कॉग्निज़ेबल अपराध में) अपराध पंजीकृत कर जांच/ट्रेसिंग की अनुमति देता है, तो नॉन-कॉग्निज़ेबल प्रकृति की निजी शिकायत में पोस्टल पते को jurisdictional prerequisite बनाना असंगत है।
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कोर्ट ने कहा कि BNSS के तहत समन/प्रक्रिया इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन से जारी/सर्व भी हो सकती है; साथ ही IT फ्रेमवर्क के तहत intermediaries पर डेटा संरक्षित/रिटेन करने की वैधानिक जिम्मेदारी होती है, जिससे जांच में आरोपी की पहचान संभव है।
निर्देश/परिणाम:
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को शिकायत फाइल पर लेने और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक/सोशल मीडिया माध्यमों से आरोपी को प्रक्रिया (process) जारी करने का निर्देश दिया तथा साइबर शिकायतों हेतु Criminal Rules of Practice में उपयुक्त संशोधन पर भी संकेत किया।
| Sl No. | Case Details | Party Details | Neutral Citation Number | Order Details |
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| 1 | Crl.MC 8709/2025 | MR. ANAGH, Versus STATE OF KERALA, |
2026:KER:16819 | 4520-HONOURABLE MR.JUSTICE C.S.DIAS Order Date 19-02-2026 |