गवाही शुरू होने से पहले केस में संशोधन की अनुमति, ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वाद बिंदु तय होने को ट्रायल की शुरुआत नहीं माना जा सकता। गवाही के स्तर से मुकदमे का ट्रायल शुरू होता है। इससे पहले वाद पत्र में संशोधन किया जा सकता है।

इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने फर्रुखाबाद निवासी अनेन्द्र सिंह की याचिका को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट और पुनरीक्षण अदालत के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें याची को वाद पत्र में संशोधन की अनुमति देने से इंकार किया गया था। याची ने 2015 में वसीयत के आधार पर मालिकाना हक के लिए सिविल वाद दाखिल किया था। जून 2019 में विपक्षी पक्ष पर कथित तौर पर विवादित संपत्ति पर जबरन कब्जा करने का आरोप लगा। याची ने ट्रायल कोर्ट से गुहार लगाई कि उसे मुकदमे में कब्जे की राहत से जुड़ी प्रार्थना जोड़ने की अनुमति दी जाए।

पहले फर्रुखाबाद की अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन) और बाद में पुनरीक्षण अदालत ने इस आधार पर उनकी अर्जी खारिज कर दी थी कि वादी ने तीन साल की देरी से संशोधन अर्जी तब दाखिल की, जब मुकदमा ट्रायल के स्तर पर है। हाईकोर्ट ने पाया कि मुकदमे में अभी गवाही शुरू नहीं हुई है। मुकदमा केवल वाद बिंदु तय होने के स्तर पर है।

लिहाजा, कोर्ट ने जिला अदालत के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। स्पष्ट किया कि केवल वाद बिंदु तय होने से ट्रायल शुरू नहीं होता। कानूनन ट्रायल तब शुरू होता है, जब गवाही शुरू हो जाए। इससे पहले वाद पत्र में संशोधन किया जा सकता है। महज, देरी के आधार पर संशोधन अर्जी खारिज नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने अनुच्छेद-227 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग कर याची की संशोधन अर्जी मंजूर कर ली है। साथ ही निर्देश दिया है कि याची इस आदेश की प्रमाणित प्रति तीन सप्ताह में ट्रायल कोर्ट में पेश कर दें।

Case Details

Case MATTERS UNDER ARTICLE 227 No. 14134 of 2024 at Allahabad
 Petitioner Anendra Singh
 Respondent Ram Kishan And Another
 Petitioner Counsels Devesh Kumar Verma,Suresh Chandra Verma
 Respondent Counsels Ajai Singh Kushwaha
 District Farrukhabad