WRIT – A No. – 1357 of 2026 at Allahabad : Pritam Singh Vs. State Of U.P. And 3 Others
Date of Judgment/Order 
– 26/2/2026
Court Number – 33
Judgment Type – Interlocutory Non AFR
Coram – Hon’ble Vikas Budhwar,J.
Petitioner’s Counsels – Anurag Prasad , Shivam Shukla and Vinod Kumar
Respondent’s Counsel – C.S.C.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने WRIT-A No. 1357 of 2026 में एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित करते हुए यह स्पष्ट संकेत दिया है कि जब किसी पूर्व रिट में विभागीय कार्यवाही/चार्जशीट के लिए निर्धारित समय-सीमा तय कर दी गई हो, तो उस समय-सीमा के लैप्स हो जाने के बाद विभागीय कार्रवाई आगे बढ़ाने से पहले समय-विस्तार/संशोधन के लिए विधिवत आदेश लेना आवश्यक है।

मामला क्या था?

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क रखा गया कि चार्जशीट दिनांक 06.11.2025 उन्हें 19.01.2026 को सर्व हुई और विभागीय कार्यवाही जारी नहीं रह सकती—क्योंकि पहले के मुकदमे Writ-A No. 14792 of 2025 में दिनांक 26.09.2025 को कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि:

  • 26.09.2025 से 3 सप्ताह में चार्जशीट जारी हो,

  • उसके बाद 2 सप्ताह में उत्तर दाखिल हो,

  • और 6 सप्ताह में जाँच/इन्क्वायरी पूरी हो,

  • तथा निर्धारित समय में कार्यवाही पूरी न होने पर सस्पेंशन स्वतः रद्द माना जाएगा।

याचिकाकर्ता का कहना था कि 06.11.2025 की चार्जशीट, 26.09.2025 के आदेश में निर्धारित समय-सीमा से काफी बाद की है।

कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी बिंदु

याचिकाकर्ता ने Full Bench के निर्णय Abhishek Prabhakar Awasthi v. New India Assurance Co. Ltd. (2014 (6) ADJ 641) पर भरोसा करते हुए कहा कि यदि कोर्ट द्वारा तय समय-सीमा के भीतर विभागीय कदम नहीं उठाए गए, तो विभागीय कार्यवाही आगे बढ़ाने से पहले विधिवत समय-विस्तार/आदेश संशोधन की अर्जी देना और उसका स्वीकृत होना जरूरी है।

इसके अतिरिक्त, सस्पेंशन को continuous cause of action बताते हुए Munna Lal Tewari (1985 AWC 692) तथा Surya Bali Ram (1995 AWC 1514) पर भी भरोसा दर्शाया गया कि पहले मुकदमे/चुनौती के बाद भी सस्पेंशन से संबंधित नई/दूसरी रिट maintainable हो सकती है।

कोर्ट की prima facie (प्रथम दृष्टया) राय

दिनांक 26.02.2026 को प्रस्तुत निर्देशों (Joint Director, Panchayati Raj, U.P. द्वारा) पर कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण बात दर्ज की कि निर्देशों में यह नहीं बताया गया कि चार्जशीट की सर्विस में याचिकाकर्ता की कोई गलती थी।

इसके बाद कोर्ट ने prima facie यह माना कि:

  • जब Writ-A No. 14792 of 2025 में तय समय-सीमा लैप्स हो चुकी थी,

  • तब विभाग को याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय रूप से आगे बढ़ने से पहले समय-विस्तार लेना चाहिए था।

अंतरिम राहत: विभागीय कार्यवाही पर स्टे + री-इंस्टेटमेंट

कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली तिथि तक चार्जशीट दिनांक 06.11.2025 के आधार पर शुरू की गई पूरी विभागीय कार्यवाही/इन्क्वायरी स्थगित (Stayed) रहेगी, और चूँकि इन्क्वायरी स्टे है, इसलिए याचिकाकर्ता री-इंस्टेटमेंट (बहाली) का हकदार है।

आगे की तारीखें (प्रक्रियात्मक निर्देश)

  • राज्य की ओर से काउंटर एफिडेविट: 20.03.2026 तक

  • याचिकाकर्ता का रिजॉइंडर एफिडेविट: 24.03.2026 तक

  • अगली लिस्टिंग: 31.03.2026, समय 2:00 PM (Additional Cause List)

क्यों है यह आदेश व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण?

यह आदेश सरकारी/विभागीय सेवा मामलों में एक उपयोगी संकेत देता है कि:

  1. कोर्ट-निर्धारित समय-सीमा का पालन केवल “औपचारिक” नहीं है—उसकी अवहेलना पर कार्यवाही स्टे हो सकती है।

  2. समय-सीमा निकल जाने के बाद विभाग यदि आगे बढ़ता है, तो उसे पहले समय-विस्तार/संशोधन का आदेश लेने की जरूरत पड़ सकती है (विशेषकर जब Full Bench का दृष्टिकोण लागू हो)।

  3. यदि इन्क्वायरी स्टे हो जाती है, तो कर्मचारी के लिए बहाली का आधार बन सकता है—जैसा कि इस आदेश में स्पष्ट किया गया।

निष्कर्ष: 26 फरवरी 2026 का यह अंतरिम आदेश विभागीय अनुशासनात्मक मामलों में timeline compliance और court directions की बाध्यता को रेखांकित करता है—और यह भी कि बिना उचित समय-विस्तार के देर से जारी/सर्व हुई चार्जशीट के आधार पर कार्यवाही चलाना न्यायालय की दृष्टि में प्रथम दृष्टया असंगत माना जा सकता है।