WRIT – A No. – 27948 of 2010 at Allahabad : Ram Swaroop Shukla Vs. State of U.P. and Others
Date of Judgment/Order – 27/2/2026
Court Number – 39
Judgment Type – Final AFR
Coram – Hon’ble Anish Kumar Gupta,J.
Petitioner’s Counsels – Ashok Khare , Rakesh Kr. Shukla , Rakesh Kumar Shukla , Santosh Kumar Srivastava and Suresh C. Dwivedi
Respondent’s Counsel – C.S.C.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि विभागीय (अनुशासनात्मक) कार्यवाही में कर्मचारी को मौखिक सुनवाई/ओरल इन्क्वायरी का अवसर देना प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का अनिवार्य हिस्सा है। सिर्फ चार्जशीट–जवाब–दस्तावेज देखकर, बिना “डेट फिक्स” किए और बिना “ओरल इन्क्वायरी” कराए जांच पूरी कर देना कानूनी रूप से दोषपूर्ण माना जाएगा।
1) क्या था मामला? (Facts)
याचिकाकर्ता की नियुक्ति 1980 में लेखपाल के पद पर हुई थी और 2008 में झांसी के क्षेत्र में तैनाती रही। उनके खिलाफ कुछ राजस्व अभिलेख/म्यूटेशन से संबंधित आरोपों के आधार पर आपराधिक एफआईआर भी दर्ज हुई, जिसमें एक केस में विवेचना के बाद फाइनल रिपोर्ट भी दाखिल होने का उल्लेख है। इसके बाद 11.11.2008 को निलंबन हुआ और 21.03.2009 को विभागीय आरोपपत्र जारी किया गया।
आरोपपत्र में मुख्यतः 3 आरोप थे—
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राजस्व अभिलेखागार से खाता संख्या 349 (1359 फसली) की फाइल में से प०क०-11-क का आदेश “फाड़/चोरी” कर राजस्व अभिलेख नष्ट करने का आरोप।
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आय से अधिक संपत्ति (अनुमति के बिना संपत्ति/खर्च आदि) का आरोप।
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ग्रामसभा भूमि के संबंध में गलत/फर्जी आख्या देकर भूमि-श्रेणी परिवर्तन की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आरोप।
2) विभागीय जांच में “कहां चूक” हुई?
हाई कोर्ट के सामने सबसे बड़ा मुद्दा यह आया कि—
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चार्जशीट में विभाग ने गवाहों की सूची प्रस्तावित नहीं की (डॉक्यूमेंट्स का उल्लेख था, पर गवाह नहीं)।
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कर्मचारी ने भी अपने जवाब में गवाह प्रस्तावित नहीं किए, लेकिन कुछ दस्तावेज संलग्न किए।
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इसके बावजूद, जांच अधिकारी ने बिना कोई तारीख/समय तय किए, बिना मौखिक सुनवाई कराए, और बिना गवाहों की मौखिक गवाही रिकॉर्ड किए—सिर्फ रिकॉर्ड देखकर निष्कर्ष दे दिया और आरोप सिद्ध/आंशिक सिद्ध मान लिए।
फिर जांच रिपोर्ट के आधार पर शो-कॉज, जवाब और अंततः सेवा-समाप्ति (17.12.2009) कर दी गई; अपील भी खारिज हो गई।
3) कानून क्या कहता है? (Rule 7, 1999 Rules + Natural Justice)
कोर्ट ने U.P. Government Servant (Discipline & Appeal) Rules, 1999 के Rule 7 की प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की—चार्जशीट, दस्तावेज/गवाह, सुनवाई, साक्ष्य, क्रॉस-एग्जामिनेशन आदि।
राज्य का तर्क था कि जब दोनों पक्षों ने गवाह नहीं दिए, तो मौखिक सुनवाई जरूरी नहीं। लेकिन कोर्ट ने Kaptan Singh वाले Division Bench के सिद्धान्त को “बाइंडिंग प्रीसिडेंट” मानते हुए कहा कि—
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भले ही गवाह प्रस्तावित न हों, फिर भी जांच अधिकारी को इन्क्वायरी की तारीख तय करनी चाहिए,
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कर्मचारी को ओरल इन्क्वायरी/सुनवाई में आरोपों व साक्ष्यों के संबंध में कनफ्रंट कर स्पष्टीकरण लेना चाहिए,
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यह अवसर Article 14 और 311 के तहत प्राकृतिक न्याय का “sine qua non” हिस्सा है।
साथ ही कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का संदर्भ लिया कि विभागीय कार्यवाही quasi-judicial होती है, निष्कर्ष कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य पर आधारित होने चाहिए; केवल संदेह/अनुमान पर्याप्त नहीं।
4) हाई कोर्ट का निष्कर्ष (Outcome)
कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि—
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याचिकाकर्ता के जवाब के बाद कोई डेट/टाइम फिक्स नहीं हुआ,
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मौखिक सुनवाई नहीं दी गई,
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इसलिए जांच रिपोर्ट के आधार पर सेवा-समाप्ति/अपील आदेश टिकाऊ नहीं हैं।
फलस्वरूप:
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17.12.2009 का टर्मिनेशन आदेश और 30.04.2010 का अपीलीय आदेश सेट-एसाइड कर दिए गए।
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सामान्यतः केस वापस (remand) भेजा जा सकता था, लेकिन कर्मचारी 09.01.2018 को सुपरएनुएट हो चुका था, इसलिए कोर्ट ने कहा कि अब remand से “फलदायी उद्देश्य” नहीं होगा।