प्लेटफॉर्म को तीन घंटे में हटाने होंगे डीपफेक वीडियो-फोटो: नए आईटी नियमों का सख्त संदेश

केंद्र सरकार ने इंटरनेट मीडिया पर फैल रहे डीपफेक और एआई-जनरेटेड (Synthetic) कंटेंट पर सख्त रुख अपनाते हुए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के अनुसार, यदि किसी प्लेटफॉर्म पर डीपफेक वीडियो या फोटो अपलोड की जाती है, तो उसे अधिकतम तीन घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य होगा। पहले यह समयसीमा 36 घंटे थी, जिसे अब काफी घटा दिया गया है। इस कदम का उद्देश्य बच्चों, महिलाओं और आम नागरिकों को डिजिटल धोखाधड़ी, मानहानि और मानसिक उत्पीड़न से बचाना है।

डीपफेक का बढ़ता खतरा

डीपफेक तकनीक के माध्यम से किसी व्यक्ति की तस्वीर, आवाज या वीडियो को इस तरह बदला जाता है कि वह वास्तविक प्रतीत हो, जबकि वह पूरी तरह कृत्रिम होता है। हाल के वर्षों में डीपफेक का उपयोग फर्जी वीडियो, अश्लील सामग्री, राजनीतिक दुष्प्रचार और ठगी के लिए बढ़ा है। इससे न केवल व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है, बल्कि समाज में भ्रम और अविश्वास भी फैलता है।

सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद एल्गोरिद्म बच्चों और युवाओं को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखते हैं, जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में, सरकार ने प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय करने का निर्णय लिया है।

नए आईटी नियमों के प्रमुख प्रावधान

इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में संशोधन कर कई अहम प्रावधान जोड़े हैं—

  1. तीन घंटे में हटाना अनिवार्य
    किसी सक्षम प्राधिकरण या अदालत द्वारा चिन्हित डीपफेक/एआई-जनरेटेड कंटेंट को तीन घंटे के भीतर हटाना होगा।

  2. स्पष्ट लेबलिंग की बाध्यता
    जिन प्लेटफॉर्म्स पर एआई या सिंथेटिक कंटेंट बनाया या साझा किया जाता है, वहां उस सामग्री पर स्पष्ट और प्रमुख लेबल लगाना अनिवार्य होगा कि वह एआई-जनरेटेड है।

  3. मेटाडेटा/पहचान चिन्ह
    जहां तकनीकी रूप से संभव हो, वहां स्थायी मेटाडेटा या पहचान चिन्ह जोड़ना आवश्यक होगा। एक बार लगाए गए लेबल या मेटाडेटा को हटाने या दबाने की अनुमति नहीं होगी।

  4. ऑटोमेटेड टूल्स की तैनाती
    अवैध, भ्रामक, बाल-शोषण, बिना सहमति वाले या फर्जी दस्तावेज़ों से जुड़े कंटेंट को रोकने के लिए प्लेटफॉर्म्स को ऑटोमेटेड टूल्स लगाने होंगे।

बड़ी टेक कंपनियों पर दबाव

इन नियमों के प्रभाव में Meta और Google जैसी बड़ी टेक कंपनियां भी आती हैं, जिनके प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट की मात्रा अत्यधिक है। बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और लक्षित एल्गोरिद्मिक डिज़ाइन को लेकर इन कंपनियों पर पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। नए नियमों से उनकी कानूनी जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

मुकदमे और न्यायिक निगरानी

लॉस एंजिल्स सहित विभिन्न स्थानों पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मुकदमे दायर किए गए हैं, जिनमें आरोप है कि प्लेटफॉर्म्स ने बच्चों को लक्षित कर ऐसे फीचर्स बनाए जो उन्हें लंबे समय तक स्क्रीन से बांधे रखते हैं। भारत में भी अब सरकार और अदालतें इस विषय पर अधिक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

20 फरवरी 2026 से प्रभाव

सरकार ने स्पष्ट किया है कि ये नए नियम 20 फरवरी 2026 से प्रभावी होंगे। इसका अर्थ है कि सभी सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अपनी नीतियों, तकनीकी संरचना और शिकायत निवारण तंत्र को समय रहते अपडेट करना होगा। अनुपालन न करने पर प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई संभव है।

निष्कर्ष

डीपफेक और एआई-जनरेटेड कंटेंट डिजिटल युग की एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। सरकार के नए निर्देश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास हैं। यदि इन नियमों का प्रभावी और निष्पक्ष पालन होता है, तो यह न केवल इंटरनेट को अधिक सुरक्षित बनाएगा, बल्कि आम नागरिकों के सम्मान, गोपनीयता और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

Gazette Notification dated 10.02.2026-IT Rules 2021 amendments-Synthetically Generated Information (SGI)