उत्तर प्रदेश में अब केवल एफआईआर दर्ज करना ही पर्याप्त नहीं माना जाएगा, बल्कि यदि विवेचना के बाद यह सामने आता है कि शिकायतकर्ता ने जानबूझकर झूठे तथ्य देकर पुलिस मशीनरी का दुरुपयोग किया है, तो उसके विरुद्ध भी विधिक कार्रवाई की जाएगी। इसी दिशा में पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश द्वारा डीजी परिपत्र संख्या 17/2026 जारी किया गया है। यह परिपत्र इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय Application U/S 528 BNSS No. 12575 of 2025, Umme Farva v. State of U.P. & Others दिनांक 14.01.2026 के अनुपालन में जारी हुआ है।

इस परिपत्र का मूल संदेश यह है कि यदि किसी प्रकरण में विवेचना के बाद अंतिम रिपोर्ट या क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाती है और यह पाया जाता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में दर्ज तथ्य गलत, भ्रामक या दुर्भावनापूर्ण थे, तो केवल क्लोजर रिपोर्ट देकर मामला समाप्त नहीं किया जाएगा। ऐसे मामलों में झूठी सूचना देने वाले शिकायतकर्ता तथा झूठी गवाही देने वाले साक्षियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 212 एवं 217 के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य होगा। परिपत्र में यह भी स्पष्ट है कि यह कार्रवाई BNSS की धारा 215(1)(a) के अनुरूप लिखित शिकायत के माध्यम से की जाएगी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह रेखांकित किया कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस को ऐसी झूठी सूचना देता है जिससे लोक सेवक अपनी वैध शक्तियों का प्रयोग किसी अन्य व्यक्ति को हानि पहुँचाने के लिए कर बैठे, तो यह केवल एक सामान्य त्रुटि नहीं, बल्कि विधिक दायित्व को सक्रिय करने वाला गंभीर कृत्य है। न्यायालय ने कहा कि विवेचक की जिम्मेदारी केवल अंतिम रिपोर्ट लगाने तक सीमित नहीं है; उसे झूठी सूचना देने वालों के विरुद्ध भी नियमानुसार लिखित शिकायत दाखिल करनी चाहिए। इसी कानूनी सोच को प्रशासनिक रूप देने के लिए डीजीपी ने समस्त पुलिस अधिकारियों को निर्देशित किया है।

यह परिपत्र अंधाधुंध कार्रवाई का आदेश नहीं देता। इसमें साफ कहा गया है कि हर क्लोजर रिपोर्ट वाले मामले में स्वतः परिवाद नहीं किया जाएगा। यदि किसी प्रकरण में केवल साक्ष्य न मिलने के कारण अंतिम रिपोर्ट लगी है, तो मात्र उसी आधार पर शिकायतकर्ता को झूठा नहीं माना जाएगा। कार्रवाई वहीं की जाएगी जहाँ विवेचना से यह स्पष्ट हो कि आरोप जानबूझकर गलत, असत्य, बढ़ा-चढ़ाकर या किसी को परेशान करने की नीयत से लगाए गए थे। यानी परिपत्र का उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों को डराना नहीं, बल्कि दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी पर रोक लगाना है।

परिपत्र में एक और उल्लेखनीय बात यह है कि संबंधित व्यक्तियों के बयान ऑडियो-वीडियो माध्यम से रिकॉर्ड किए जाने पर भी जोर दिया गया है। साथ ही, ऐसे मामलों का पृथक अभिलेखीकरण करने, रजिस्टर में प्रविष्टि रखने, थाना स्तर से लेकर पर्यवेक्षण स्तर तक समीक्षा करने और लोक अभियोजन से समन्वय बनाकर समय से परिवाद प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। यह दर्शाता है कि अब इस विषय को केवल न्यायिक टिप्पणी की तरह नहीं, बल्कि एक संस्थागत अनुपालन तंत्र के रूप में लागू करने की तैयारी है।

न्यायालय के निर्णय में यह भी रेखांकित हुआ कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 212 और 217 को निरर्थक नहीं बनने दिया जा सकता। यदि झूठी सूचना देकर किसी निर्दोष व्यक्ति को आपराधिक प्रक्रिया में घसीटा गया है, तो कानून केवल आरोपी को राहत देने पर नहीं रुकेगा, बल्कि झूठी सूचना देने वाले के विरुद्ध भी प्रक्रिया चलनी चाहिए। इस दृष्टि से यह आदेश न्याय व्यवस्था में जवाबदेही का संतुलन स्थापित करता है।

व्यावहारिक रूप से देखें तो इस परिपत्र का असर दो स्तरों पर पड़ेगा। पहला, पुलिस विवेचना अब केवल आरोप सिद्ध या असिद्ध होने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि शिकायत की सत्यनिष्ठा भी गंभीर परीक्षण के दायरे में आएगी। दूसरा, ऐसे लोग जो निजी रंजिश, पारिवारिक विवाद, प्रतिष्ठा धूमिल करने या दबाव बनाने के उद्देश्य से झूठे मुकदमे दर्ज कराते हैं, उनके लिए यह एक स्पष्ट चेतावनी है कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग अब स्वयं दंडात्मक परिणाम पैदा कर सकता है।

कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में यह परिपत्र आपराधिक न्याय प्रणाली में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है। अब फोकस केवल अपराध की जांच पर नहीं, बल्कि झूठी शिकायतों के माध्यम से न्यायिक और पुलिस तंत्र के दुरुपयोग को रोकने पर भी है। यदि इन निर्देशों का ईमानदारी से पालन हुआ, तो इससे न केवल निर्दोष व्यक्तियों को अनावश्यक मुकदमों से राहत मिलेगी, बल्कि न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।

परिपत्र संख्या-17 Application U/S 526 BNSS No. 12575/2025 Umme Farva Vs. State of UP & Ors. में मा0 उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा पारित निर्णय दिनांकित 14.01.2026 में दिये गये निर्देशों के अनुपालन में झूठी एफ0आई0आर0 लिखाने वाले शिकायतकर्ता तथा झूठी गवाही देने वाले साक्षियों के विरुद्ध परिवाद दाखिल करने हेतु दिशा-निर्देश।