- इलाहाबाद हाईकोर्ट: गैर-संज्ञेय धाराओं में FIR दर्ज कर “स्टेट केस” की तरह संज्ञान लेना गलत; मजिस्ट्रेट का आदेश निरस्त, मामला वापस भेजा
- क्या मामला था?
- प्रक्रिया में क्या हुआ?
- हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- आदेश: मजिस्ट्रेट का संज्ञान-समन आदेश निरस्त; नए सिरे से आदेश देने के निर्देश
- अतिरिक्त दिशा-निर्देश: “झूठी/भ्रामक सूचना” वाले मामलों में लिखित शिकायत
इलाहाबाद हाईकोर्ट: गैर-संज्ञेय धाराओं में FIR दर्ज कर “स्टेट केस” की तरह संज्ञान लेना गलत; मजिस्ट्रेट का आदेश निरस्त, मामला वापस भेजा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने Umme Farva v. State of U.P. & Another (Application u/s 528 BNSS No. 12575 of 2025) में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि IPC की धारा 504 व 507 (दोनों गैर-संज्ञेय) के मामले में पुलिस को FIR दर्ज करने के बजाय NCR (Non-Cognizable Report) दर्ज करनी चाहिए थी; साथ ही ऐसे गैर-संज्ञेय अपराधों में “पुलिस केस/स्टेट केस” की तरह संज्ञान लेना प्रक्रिया-विरुद्ध है।
क्या मामला था?
अदालत के सामने आए रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता (ओ.पी.-2) ने पत्नी/आवेदिका के विरुद्ध सोशल मीडिया के जरिए मानहानि/धमकी आदि के आरोप लगाते हुए थाना-क्वार्सी, जनपद-अलीगढ़ में केस क्राइम संख्या 1004/2023 दर्ज कराया। FIR में बताया गया कि पत्नी व उसके कथित साथी द्वारा फेसबुक के माध्यम से शिकायतकर्ता व उसकी बेटी को बदनाम किया जा रहा है और धमकियां दी जा रही हैं।
प्रक्रिया में क्या हुआ?
जांच के बाद 19.06.2024 को पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट/क्लोज़र रिपोर्ट दी। इसके विरुद्ध शिकायतकर्ता ने प्रोटेस्ट पिटीशन दायर की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने फाइनल रिपोर्ट अस्वीकार कर धारा 190(1)(b) CrPC के तहत संज्ञान लेते हुए कार्यवाही आगे बढ़ाई (जिसे इस याचिका में चुनौती दी गई)।
हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
-
धारा 504 व 507 IPC में अधिकतम सजा दो वर्ष है और ये गैर-संज्ञेय हैं; इसलिए SHO को इसे NCR के रूप में लेना चाहिए था, FIR के रूप में नहीं।
-
कोर्ट ने UP Police Regulations (Para 97, 102, 103) का हवाला देते हुए कहा कि FIR/NCR का पंजीकरण कानून के अनुसार होना चाहिए; अन्यथा यह Article 21 के तहत “procedure established by law” के उल्लंघन की ओर ले जा सकता है।
-
BNSS/CrPC की व्याख्या के अनुसार, गैर-संज्ञेय मामले में पुलिस रिपोर्ट/रिपोर्टिंग को “शिकायत (complaint)” के रूप में ट्रीट करने की प्रक्रिया का पालन आवश्यक है; ऐसे मामलों में “स्टेट केस” की तरह आगे बढ़ना उचित नहीं माना गया।
आदेश: मजिस्ट्रेट का संज्ञान-समन आदेश निरस्त; नए सिरे से आदेश देने के निर्देश
हाईकोर्ट ने कॉग्निज़ेंस-कम-समनिंग आदेश को quash/set aside करते हुए मामला निचली अदालत (Judicial Magistrate) को वापस भेज दिया और निर्देश दिया कि आरोपियों को सुनवाई का अवसर देकर कानून के अनुसार नया आदेश पारित किया जाए (तीन माह के भीतर)।
अतिरिक्त दिशा-निर्देश: “झूठी/भ्रामक सूचना” वाले मामलों में लिखित शिकायत
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि क्लोज़र रिपोर्ट अभियुक्त के पक्ष में आती है, तो मजिस्ट्रेट पुलिस/IO से धारा 215(1)(a) BNSS (समतुल्य धारा 195(1)(a) CrPC) के तहत सूचनाकर्ता/गवाहों के विरुद्ध लिखित शिकायत (Sections 177/182 IPC समतुल्य 212/217 BNS) दाखिल कराने की दिशा में आदेश दें।